सुप्रीम कोर्ट सख्त: NCLT की बदहाली पर जताई चिंता, कहा—'युद्ध स्तर पर काम करने की जरूरत, वरना फेल हो जाएगा दिवाला कानून'
नई दिल्ली | कानूनी डेस्क: भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने देश भर के नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की मौजूदा स्थिति को "गंभीर और निराशाजनक" करार दिया है। कोर्ट ने साफ चेतावनी दी है कि यदि बुनियादी ढांचे, कर्मचारियों की कमी और मैनपावर जैसे मुद्दों को 'युद्ध स्तर' (War Footing) पर हल नहीं किया गया, तो इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) का पूरा उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।
738 दिनों तक की देरी: आंकड़ों ने चौंकाया
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने दिल्ली स्थित NCLT प्रिंसिपल बेंच की रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद यह टिप्पणी की। रिपोर्ट के अनुसार:
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देश भर में 383 आवेदन लंबित हैं, जो केवल रेजोल्यूशन प्लान की मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं।
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इन मामलों में देरी 48 दिनों से लेकर 738 दिनों (2 साल से अधिक) तक की है।
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कुछ विशेष मामलों में तो रेजोल्यूशन प्लान की मंजूरी में 4 साल तक का वक्त लग रहा है।
मैनपावर का गंभीर संकट
सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि NCLT में सदस्यों की भारी कमी है। स्वीकृत 63 सदस्यों की संख्या के मुकाबले केवल 54 सदस्य (28 न्यायिक और 26 तकनीकी) ही कार्यरत हैं। कोर्ट ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि रजिस्ट्रार जैसे महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियां कॉन्ट्रैक्ट (संविदा) के आधार पर की जा रही हैं, जो न्यायपालिका के कामकाज के लिए "अनसुना" है।
बुनियादी ढांचे और वेतन की समस्या
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण ट्रिब्यूनल को कई बार केवल आधे दिन ही काम करना पड़ता है। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि बेंचों की सहायता करने वाले कर्मचारियों को समय पर वेतन और भत्ते नहीं मिल रहे हैं। कोर्ट ने सवाल किया, "क्या आप उम्मीद करते हैं कि ऐसे हालातों में कोई निर्णायक संस्था इतने महत्वपूर्ण मामलों का निपटारा कर पाएगी?"
CJI को भेजा मामला: लिया गया 'Suo Motu' संज्ञान
मामले की गंभीरता को देखते हुए पीठ ने इस पर स्वत: संज्ञान (Suo Motu) लिया है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि इस मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के समक्ष रखा जाए ताकि इसे एक उचित बेंच को सौंपा जा सके और इन व्यवस्थागत खामियों को जल्द से जल्द दूर किया जा सके।
Chief Editor की विशेष टिप्पणी:
NCLT का सुस्त पड़ना न केवल निवेशकों के भरोसे को तोड़ता है, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था की गति को भी रोकता है। Mission Ki Awaaz का मानना है कि दिवाला कानून (IBC) की सफलता केवल कागजों पर नहीं, बल्कि धरातल पर मजबूत बुनियादी ढांचे और नियुक्तियों से ही संभव है।
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