राजस्थान

करौली के किसानों का कमाल: पारंपरिक खेती छोड़ अपनाई आधुनिक तकनीक, अब लाखों में हो रही कमाई

By समाचार कक्ष 🕒 01 May 2026 👁️ 15 Views ⏳ 1 Min Read
करौली के किसानों का कमाल: पारंपरिक खेती छोड़ अपनाई आधुनिक तकनीक, अब लाखों में हो रही कमाई

करौली (राजस्थान): रेगिस्तानी राज्य राजस्थान के करौली जिले से खुशहाली की एक नई इबारत लिखी जा रही है। यहाँ के किसानों ने यह साबित कर दिया है कि यदि दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ आधुनिक तकनीक और सरकारी योजनाओं का साथ मिले, तो मिट्टी से सोना उगाया जा सकता है। जिले के दो किसानों—अशोक सिंह और सुभाष बैरवा—की सफलता की कहानियाँ आज पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय हैं।

केस स्टडी 1: प्लास्टिक मल्चिंग और ड्रिप सिंचाई से अशोक सिंह की 'स्मार्ट खेती'

सपोटरा तहसील के अमरगढ़ निवासी अशोक सिंह कभी साधारण खेती से मुश्किल से गुजारा करते थे। लेकिन उद्यान विभाग के संपर्क में आने के बाद उन्होंने अपनी तकदीर बदल ली।

  • आधुनिक संसाधन: अशोक आज सौर ऊर्जा पंप, ड्रिप और फव्वारा सिंचाई जैसी इजरायली तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं।

  • अगेती खेती: लो-टनल और प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक से वे बेमौसम सब्जियां उगाते हैं, जिससे उन्हें बाजार में अधिक दाम मिलता है।

  • मुनाफे का गणित: टमाटर की मचान (Staking) विधि और अमरूद की सघन बागवानी ने उनकी आय को दोगुना कर दिया है। आज उनके खेत के उत्पाद जयपुर और दिल्ली जैसे बड़े महानगरों की मंडियों में अपनी चमक बिखेर रहे हैं।

केस स्टडी 2: पॉलीहाउस ने सुभाष बैरवा को बनाया 'लखपति किसान'

टोडाभीम तहसील के चुरपुरा गाँव के सुभाष बैरवा की कहानी संघर्ष से सफलता तक की है। पहले एक मंडी में मुनीम का काम करने वाले सुभाष ने साल 2016 में राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत पॉलीहाउस की शुरुआत की।

  • रिकॉर्ड उत्पादन: सुभाष ने जैविक खाद और उन्नत बीजों के प्रयोग से एक ही सीजन में 42 मीट्रिक टन खीरे का उत्पादन कर सबको चौंका दिया।

  • बदली जीवनशैली: जहाँ वे पहले सालभर में कुछ हजार ही बचा पाते थे, अब पॉलीहाउस खेती से उन्हें प्रतिवर्ष लगभग 12 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा हो रहा है।

  • भविष्य की योजना: अपनी सफलता से उत्साहित सुभाष अब अपने पॉलीहाउस का दायरा 4000 वर्ग मीटर तक बढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं।

विशेषज्ञों की सलाह: पारंपरिक ढर्रे से बाहर निकलें किसान

इन सफल किसानों का संदेश स्पष्ट है—सरकार उद्यानिकी और आधुनिक कृषि उपकरणों पर भारी सब्सिडी (अनुदान) दे रही है। अशोक और सुभाष दोनों का मानना है कि ड्रिप सिंचाई से न केवल पानी की बचत होती है, बल्कि फसल की गुणवत्ता भी बढ़ती है। उन्होंने जिले के अन्य युवाओं और किसानों से आह्वान किया है कि वे तकनीक को अपनाकर खेती को घाटे के सौदे से मुनाफे के व्यवसाय में बदलें।

डिस्क्लेमर (Disclaimer): यह लेख सूचना एवं जनसम्पर्क कार्यालय (DIPR), करौली द्वारा साझा की गई सफलता की कहानियों पर आधारित है। खेती में मुनाफा बाजार की स्थितियों, मौसम और व्यक्तिगत प्रबंधन पर निर्भर करता है। किसी भी तकनीक या योजना को अपनाने से पहले अपने नजदीकी कृषि पर्यवेक्षक या उद्यान विभाग के कार्यालय से विस्तृत जानकारी एवं मार्गदर्शन अवश्य प्राप्त करें। लेखक या प्रकाशक किसी भी वित्तीय लाभ या हानि के लिए जिम्मेदार नहीं होंगे।

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